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Archive for the ‘Uncategorized’ Category

PostHeaderIcon बेजोड़ लावणी… फिल्म नटरंग से…


आज सुनेंगे ऐसा संगीत जो की प्रांतीय है यानी की प्रादेशिक है और नयी पीढ़ी का पसंदीदा है I बात विरोधाभासी है लेकिन सच है I आज हम मराठी फिल्म ‘नटरंग’ का गीत सुनेंगे I इसका संगीत दिग्दर्शन किया है अजय-अतुल ने, जो की काबिल-ए-दाद है I मराठी लावणी की स्टाइल को बरकरार रखकर distortion guitar, synth sounds का अद्भूत संगम इसमें किया गया है I आज जो गाना हम सुनने जा रहे है उस गाने की विशेषता है उसका अद्भूत एरेंजमेंट, उस गाने में उपयुक्त किये गए ताल वाद्य एवं ताल, और इस गाने की गायकी ( यह गाना बेला शिंदे और अजय-अतुल ने गाया है ) I दक्षिण भारत ने तो अपनी प्रादेशिक संगीत की लोकप्रियता, लोकचाहना के बलबूते पर साबित कर ही दी है, लेकिन उत्तर भारत का प्रादेशिक संगीत इतना लोकप्रिय हो एवं की जिसमे प्राचीन एवं अर्वाचीन गतिविधियों का सुभग संयोग हो ये ‘नटरंग’ के संगीत से माध्यमित होता है I अब तो विधविध प्रदेश के कई महानुभाव प्रादेशिक संगीत को अर्वाचीन पोशाक में प्रस्तुत करने लगे है जो की एक सराहनीय प्रयास है I गाने का नाम है “अप्सरा आली…” जो की मराठी फिल्म ‘नटरंग’ से है… सुनते है और मुग्ध होते है…

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PostHeaderIcon ‘उदास पानी’ – गुलज़ार

gulzar


गुलज़ार साहब उन कुछ हस्तियोंमें से है जिनका परिचय देने के लिए शब्दप्रयोग करना उचित नहीं है… गुलज़ार महसूस करने के लिए है… उनकी एक नज़म हमारी कितनी घडिया..कितनी रातें बसर कर देती है I कभी कभी तो ये लगता है की हमारी सोच जहा ख़तम होती है वहा उनकी सोच शुरू होती है I उनके शब्दप्रयोग भी बड़े ही अनूठे है, औरो की रचनाओं में ऐसे प्रयोग कम ही दिखाई देते है… चाँद और सूरज को तो गुलज़ार जेब में लेकर घुमते है, जहा मर्जी चाहा जेब से निकाल कर किसी के भी साथ जोड़ दिया I तो आज उनकी ही एक नज़म सुनते है, उनकी ही आवाज़ में…


यह नज़म गुलज़ार की एक rare album ” उदास पानी” से है, इस album की खासियत ये है की इसमे अलग अलग राग पर आधारित fusions है जो की विख्यात music composer अभिषेक राय ने compose किये है, और साथ ही में गुलज़ार साहब की नज़म, उन्ही की आवाज़ में… really, a wonderful experience….
प्रस्तुत नज़म का title है “अलाव” और साथ में जो fusion बज रहा है वो राग दरबारी में है I दरबारी में गाये गए आलाप एवं बजाये गए सितार और वायोलिन काबिल-ए-दाद है I
तो लीजिये सुनिए एक बेहतरीन दुर्लभ गुलज़ारिश….

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ये रहे नज़म के बोल…
रात भर सर्द हवा चलती रही
रात भर हमने अलाव तापा
मैंने माजी से कई खुश्क सी शाखें काटीं
तुमने भी गुजरे हुये लम्हों के पत्ते तोड़े
मैंने जेबों से निकालीं सभी सूखीं नज़्में
तुमने भी हाथों से मुरझाये हुये खत खोलें
अपनी इन आंखों से मैंने कई मांजे तोड़े
और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकी
तुमने पलकों पे नामी सूख गयी थी, सो गिरा दी |
रात भर जो भी मिला उगते बदन पर हमको
काट के दाल दिया जलाते अलावों में उसे
रात भर फून्कों से हर लोऊ को जगाये रखा
और दो जिस्मों के ईंधन को जलाए रखा
रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने |

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या देवी सर्वभूतेषु कला रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।।

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