Archive for December 30th, 2009
‘उदास पानी’ – गुलज़ार
गुलज़ार साहब उन कुछ हस्तियोंमें से है जिनका परिचय देने के लिए शब्दप्रयोग करना उचित नहीं है… गुलज़ार महसूस करने के लिए है… उनकी एक नज़म हमारी कितनी घडिया..कितनी रातें बसर कर देती है I कभी कभी तो ये लगता है की हमारी सोच जहा ख़तम होती है वहा उनकी सोच शुरू होती है I उनके शब्दप्रयोग भी बड़े ही अनूठे है, औरो की रचनाओं में ऐसे प्रयोग कम ही दिखाई देते है… चाँद और सूरज को तो गुलज़ार जेब में लेकर घुमते है, जहा मर्जी चाहा जेब से निकाल कर किसी के भी साथ जोड़ दिया I तो आज उनकी ही एक नज़म सुनते है, उनकी ही आवाज़ में…
यह नज़म गुलज़ार की एक rare album ” उदास पानी” से है, इस album की खासियत ये है की इसमे अलग अलग राग पर आधारित fusions है जो की विख्यात music composer अभिषेक राय ने compose किये है, और साथ ही में गुलज़ार साहब की नज़म, उन्ही की आवाज़ में… really, a wonderful experience….
प्रस्तुत नज़म का title है “अलाव” और साथ में जो fusion बज रहा है वो राग दरबारी में है I दरबारी में गाये गए आलाप एवं बजाये गए सितार और वायोलिन काबिल-ए-दाद है I
तो लीजिये सुनिए एक बेहतरीन दुर्लभ गुलज़ारिश….
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ये रहे नज़म के बोल…
रात भर सर्द हवा चलती रही
रात भर हमने अलाव तापा
मैंने माजी से कई खुश्क सी शाखें काटीं
तुमने भी गुजरे हुये लम्हों के पत्ते तोड़े
मैंने जेबों से निकालीं सभी सूखीं नज़्में
तुमने भी हाथों से मुरझाये हुये खत खोलें
अपनी इन आंखों से मैंने कई मांजे तोड़े
और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकी
तुमने पलकों पे नामी सूख गयी थी, सो गिरा दी |
रात भर जो भी मिला उगते बदन पर हमको
काट के दाल दिया जलाते अलावों में उसे
रात भर फून्कों से हर लोऊ को जगाये रखा
और दो जिस्मों के ईंधन को जलाए रखा
रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने |
