Archive for December, 2009
‘उदास पानी’ – गुलज़ार
गुलज़ार साहब उन कुछ हस्तियोंमें से है जिनका परिचय देने के लिए शब्दप्रयोग करना उचित नहीं है… गुलज़ार महसूस करने के लिए है… उनकी एक नज़म हमारी कितनी घडिया..कितनी रातें बसर कर देती है I कभी कभी तो ये लगता है की हमारी सोच जहा ख़तम होती है वहा उनकी सोच शुरू होती है I उनके शब्दप्रयोग भी बड़े ही अनूठे है, औरो की रचनाओं में ऐसे प्रयोग कम ही दिखाई देते है… चाँद और सूरज को तो गुलज़ार जेब में लेकर घुमते है, जहा मर्जी चाहा जेब से निकाल कर किसी के भी साथ जोड़ दिया I तो आज उनकी ही एक नज़म सुनते है, उनकी ही आवाज़ में…
यह नज़म गुलज़ार की एक rare album ” उदास पानी” से है, इस album की खासियत ये है की इसमे अलग अलग राग पर आधारित fusions है जो की विख्यात music composer अभिषेक राय ने compose किये है, और साथ ही में गुलज़ार साहब की नज़म, उन्ही की आवाज़ में… really, a wonderful experience….
प्रस्तुत नज़म का title है “अलाव” और साथ में जो fusion बज रहा है वो राग दरबारी में है I दरबारी में गाये गए आलाप एवं बजाये गए सितार और वायोलिन काबिल-ए-दाद है I
तो लीजिये सुनिए एक बेहतरीन दुर्लभ गुलज़ारिश….
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ये रहे नज़म के बोल…
रात भर सर्द हवा चलती रही
रात भर हमने अलाव तापा
मैंने माजी से कई खुश्क सी शाखें काटीं
तुमने भी गुजरे हुये लम्हों के पत्ते तोड़े
मैंने जेबों से निकालीं सभी सूखीं नज़्में
तुमने भी हाथों से मुरझाये हुये खत खोलें
अपनी इन आंखों से मैंने कई मांजे तोड़े
और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकी
तुमने पलकों पे नामी सूख गयी थी, सो गिरा दी |
रात भर जो भी मिला उगते बदन पर हमको
काट के दाल दिया जलाते अलावों में उसे
रात भर फून्कों से हर लोऊ को जगाये रखा
और दो जिस्मों के ईंधन को जलाए रखा
रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने |
“आज जाने की जिद्द ना करो…” Version 4 – ओसमान मीर…

“आज जाने की जिद्द ना करो…” श्रृंखला की इस अंतिम कड़ी में आज सुनते है यह ग़ज़ल ओसमान मीर से I ओसमान मीर कच्छ- गुजरात के उन चुनंदा बहतरीन गायकों में से है जिन्हें लोकसंगीत में तो महारथ हांसल है ही पर शास्त्रीय गायकी में भी उतनी ही निपुणता है I ओसमान मीर गुजराती लोकसंगीत जैसे की “गरबा” , “डायरा” और गुजराती लोकभजन के लिए विख्यात है I उन्हों ने कुछ ग़ज़ले भी गाई है जिनमे से एक यहाँ पर पेश की गयी है I उनकी आवाज़ की गहराई और शास्त्रीय गायकी दोनों इस ग़ज़ल में उभर कर सुनाई देते है I तो लीजिये सुनिए “आज जाने की जिद्द ना करो…..” ओसमान मीर की आवाज़ में I
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theme song: For a few dollars more…
आज एक theme song सुना रहा हुं, यह मेरे most favourite collections में से एक है… फिल्म है For a few dollars more… यह फिल्म १९६५ में रिलीझ हुई थी जिसमें most memoriable lead role अदा किया था Clint Eastwood ने और इस फिल्म के डिरेक्टर थे one of the most talented directors…Sergio Leone.
Sergio Leone ने कई बेहतरीन फिल्में डिरेक्ट की जैसे कि, For a few dollars more, Fistful of dollars, The good the bad and the ugly, once upon a time in the west and many more….
American Spheggeti style mexican cowboy movies उनकी खासियत थी I वीरान खुले मैदान, घोड़े और दाढ़ीवाले घुड़सवार, आँख और बन्दूक से बातें, ख़ाली ख़ाली रेलवे स्टेशन और ख़ाली ख़ाली ट्रेन, लूट-पाट, लकड़ी के दरवाजों की किचुड-किचुड, पैसे की लालच, बेहतरीन close ups and long shots, और लाजवाब guitars and orchestrations in background scores…… really it is a great experience to watch Sergio’s movies.
Sergio की लगभग सारी फिल्मों में संगीत दिग्दर्शक के तौर पे थे इटली के मशहूर संगीतकार और कोम्पोझर Ennio Morricone.
प्रस्तुत थीम को भी उन्हों ने ही कोम्पोझ किया है I इस थीम की खासियत है इसका अद्भूत orchastrations, arranging and guitars. it takes us through the era of cowboys of mexico in real terms….
so here is the theme song of ” For a few Dollars More…”
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